पुस्तकालय, प्यार, और प्रतिरोध: कैसे बनी लोकड़ौन में फ्री डिजिटल लाइब्रेरी!

23rd November 2020

हम जो करते हैं उसमें से बहुत कुछ विरोध पर आधारित है।

हम इस विचार का विरोध करते हैं कि साहित्य से जुड़ने का अधिकार समाज के बस कुछ एक हिस्सों को ही है। हम उन प्रथाओं का विरोध करते हैं जो पुस्तकों तक की पहुंच का अधिक्रम बनाए रखती हैं, हम पुस्तकालय की एक ऐसी छवि का भी विरोध करते हैं जिसमें उनकी परिभाषा केवल पुस्तकों से न कि उनके पाठकों से बनती है। हमारा विरोध नफरत और भेदभाव के सभी रूपों से है। हमारे पुस्तकालय विश्वसनीय, सुरक्षित, मुफ्त सामुदायिक स्थान बनने का प्रयास करते हैं जहाँ सभी का स्वागत हो।    

इस साल मार्च में, द कम्युनिटी लाइब्रेरी प्रोजेक्ट में हमें एक ऐसे मुफ्त पुस्तकालय की कल्पना करनी पड़ी जो अपना काम ऑनलाइन करे - यह एक ऐसा कदम था जिसका विरोध हमने पहले किया था जब हमारे सामुदायिक स्थान खुले थे। यह कदम काम जारी रखने की आवश्यकता से प्रेरित था, जिससे हम अपने समुदाय के साथ जुड़े रह सकें जो अचानक सामुदायिक पुस्तकालयों से कट गई थी, जहां उन्होंने पुस्तकों के साथ अपने पहले रिश्ते बनाए थे। इन सदस्यों ने पुस्तकालय के माध्यम से पाठकों के रूप में अपनी पहचान पाई थी, जो आगे चलकर एक अनूठे पढ़ने / सोचने के ढंग में तब्दील हुई। स्कूलों, पुस्तकालयों और पुस्तकों की अनुपलब्धता ने कई लोगों के लिए उस पहचान को जोखिम में डाल दिया है।   

लेकिन एक मुफ्त पुस्तकालय के लिए भौतिक स्थानों के बंद होने के समाधान के रूप में अपने ऑनलाइन अवतार को प्रस्तुत करना अपने में एक दर्दनाक अंतर्विरोध था। कोई यह कैसे कह सकता था कि ’सभी का स्वागत है’ जब हमारे समुदाय के केवल एक हिस्से के पास ही डिवाइस, इंटरनेट और तकनीकी जानकारी थी जिससे वह इस प्रयास में सम्मिलित हो सकते थें? साहित्य को उपलब्ध कराने का कार्य, पुस्तकों को शेल्फ पर रखना, इसे सुलभ बनाना नहीं है। यह बात हमारे लिए स्पष्ट थी कि हमारी डिजिटल लाइब्रेरी तभी लाभकारी होगी जब इसे ईंट-और-पेपर के जगहों के विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया जाए न कि इन भौतिक स्थानों के प्रतिस्थापन के रूप में, ताकि कुछ सदस्यों के लिए यह एक सार्थक ज़रिया हो सके जब वह शिक्षा, वित्त, सुरक्षा और शारीरिक, सामाजिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर इस महामारी के प्रभाव से जूझ रहे है। यह तभी सार्थक हो सकता था जब इसे बनाया गया हो हमारे सदस्यों के विशेष आवश्यकताओं और सीमाओं को मद्देनज़र रखते हुए।

हमने ज्यादातर ओपन-सोर्स, मुफ्त रूप से उपलब्ध किताबों का उपयोग कर 'दुनिया सबकी' का निर्माण किया, जिसमें प्रथम बुक्स और एकलव्य जैसे प्रकाशकों द्वारा मुफ्त रूप से उपलब्ध पुस्तकों का इस्तेमाल हुआ। हमने कई प्लेटफार्मों में इस लाइब्रेरी की स्थापना की - बारह व्हाट्सएप ग्रुप्स, एक वेबसाइट, एक यूट्यूब चैनल  जो सूचना और पढ़ने की सामग्री तक डिजिटल पहुंच प्रदान करने के अपने उद्देश्य में संयुक्त थे। 'दुनिया सबकी' न केवल COVID -19 पर विश्वसनीय जानकारी प्रदान करता है और पाठकों तक पुस्तकों के एक उत्कृष्ट संग्रह पहुंचाता है, बल्कि यह एक ऐसा डिजिटल पुस्तकालय भी है जो डिजिटल साक्षरता के क्षेत्र में कम डेटा खपत और अपने सदस्य की जरूरतों को प्राथमिकता देता है।   

जैसा कि नई दिल्ली में अमेरिकन एम्बेसी स्कूल में शिक्षक-लाइब्रेरियन,लिंडा होइसेथ का कहना है- "एक लाइब्रेरियन को एक ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो अपने पैट्रन के ज़रूरतों की समझ का उपयोग कर एक प्रासंगिक संग्रह का निर्माण करता है और उस तक एक प्रत्यक्ष पहुंच प्रदान करता है।" महामारी ने हमारे पैट्रनो की जरूरतों और पहुँच की चिंताओं को एक अति आवश्यक मसला बनाया है। अब जब हम अपने व्हाट्सएप चैनलों पर रीडिंग मटीरियल और रीड-अलाउड साझा करते हैं, तो हम छोटे फाइल साइज पर ज़ोर देते हैं और प्रत्येक वीडियो के लिए संबंधित ऑडियो फाइल भी उपलब्ध करते हैं। प्रत्येक हिस्सा आता है कैप्शन के साथ जो साझा की गई साहित्य के साथ जुड़ाव पैदा करे। हमारी वेबसाइट पर हमने कई ऐसे पुस्तकों को साझा किया है जो हमारे लाइब्रेरीज में पसंदीदा थीं - उनकी बाइंडिंग थोड़ी ढीली हुई, पन्ने इस्तेमाल से मुड़े हुए- उनके साथ प्रस्तुत हैं कई ऐसे पुस्तकें जो अब प्रिंट में उपलब्ध नहीं हैं।

दुनिया सबकी उन सब उम्मीद और देखभाल के साथ बनाया गया जो प्यार अपने साथ लाता है। यही है जो मेरे हिसाब से मुक्त पुस्तकालय आंदोलन को चलाता है - पाठकों, पुस्तकों, पुस्तकालयों, विचारों और समुदायों के बीच एक निरंतर, मौलिक प्रेम जो एक साथ पढ़ने, सोचने और पूछताछ करने के छोटे-छोटे कामों से संभव हुआ है।   

जैसा कि प्यार के हर काम में होता है, यहाँ भी हमने बनाया है अपने को आलोचनीय; यदि हम अपने सदस्यों के प्रति पुस्तकालय की जिम्मेदारियों के आवश्यक परिवर्तनशीलता का सामना न करें, तो एक डिजिटल उपस्थिति का निर्माण नहीं किया जा सकता है।

इस परिवर्तनशीलता को अपनाना और उससे जूझने का मतलब यह था कि हमने न केवल पढ़ने की सामग्री को साझा करने के तरीके पर काम किया, बल्कि हमारे पाठकों के बीच कौशल के निर्माण पर भी ध्यान दिया जो टेक्नोलॉजी और साक्षरता के अतिव्यापी क्षेत्र में ज़रूरी है। पुस्तकों या पीडीएफ को पढ़ने के लिए कोई वेब लिंक कैसे खोला जाता है? फ़ोन पर प्रथम बुक्स के 'स्टोरीवीवर' जैसे वेबसाइट को कैसे चलाया जाए? प्रत्येक सदस्य हमारे व्हाट्सएप ग्रुप्स को एक सुरक्षित वातावरण बनाने में कैसी भूमिका निभा सकता है?   

ये प्रश्न हमारे सदस्यों के लिए पठन सामग्री को सुलभ बनाने के कार्य में आवश्यक साबित हुए। हर जगह के लिब्ररियंस ने अपने कौशल को तेज गति से विकसित किया, ऑडियो और वीडियो रीड-अलाउड्स और ट्यूटोरियल को रिकॉर्ड करना सीखा, तकनीकी सहायता प्रदान की और इस महामारी के दौरान अपने सदस्यों की बदलती जरूरतों के साथ विकसित हुए। ये अब लाइब्रेरियन की काम के दूसरे दर्जे का पहलू नहीं हैं, लेकिन मौलिक रूप से पुस्तकों, शिक्षा और सूचना तक पहुंचने की क्षमता से जुड़ गए हैं और समुदायों में बराबरी के हमारे काम का एक महत्वपूर्ण भाग बन गए हैं।   

और फिर भी यह सच है कि हम अपने सदस्यों की एक बड़ी संख्या तक नहीं पहुँच सकते। 'दुनिया सबकी' ऐसे कई शिक्षकों, छात्रों द्वारा पढ़ी और साझा की जाती है जिन्होंने कभी पुस्तकालय में कदम नहीं रखा था, लेकिन हमारे कई सदस्य जिनके लिए पुस्तकालय उनके रोजमर्रा का एक हिस्सा थी, पुस्तकों तक पहुंच से इस महामारी में वंचित हैं। यह सदस्यों और लाइब्रेरियन के लिए दुखदाई है। सबसे बढ़कर, यह भौतिक सामुदायिक पुस्तकालय और इसकी मूलभूत लोकतांत्रिक क्षमता की पुष्टि है। 

आज, जब हम एहतियाती तरीके से पुस्तक संचलन के लिए अपने सामुदायिक स्थानों को फिर से खोलने के तरफ बढ़ रहे हैं, डिजिटल लाइब्रेरी का सवाल अब भी महत्वपूर्ण है। ऐसे पुस्तकालय सदस्य जो लोकडाउन की घोषणा के बाद अपने गाँवों के लिए रवाना हो गए थे, उनमें से कई शायद उन इलाकों में कभी लौटकर न आए जहाँ थोड़ी ही दूर पर उनका सामुदायिक पुस्तकालय था। कुछ के लिए, हमारी ऑनलाइन उपस्थिति पाठकों और विचारकों के रूप में उनकी पहचान के साथ जुड़ाव का बिंदु बनी हुई है। लेकिन कब तक? क्या डिजिटल लाइब्रेरी समय के साथ पहुंच और महत्व में बढ़ेगी या खुद को निष्फल पाएगी? जब यह एक डिवाइस, एक रिचार्ज, एक विश्वसनीय कनेक्शन के साथ अनिवार्य रूप से बाध्य हो जाता है तो यह कितना बढ़ सकता है? एक बात साफ है : पिछले वर्ष ने हमें दिखाया है कि एक समानांतर आंदोलन जो सरकारों से सभी छात्रों के लिए मुफ्त इंटरनेट और उपकरण प्रदान करने के लिए संघर्ष करता है, वास्तव में कितना महत्वपूर्ण है, क्योंकि ऑनलाइन शिक्षा का कोई भी रूप वास्तव में मुफ्त नहीं है यदि यह सीखने वाले पर इन साधनो को प्राप्त करने का बोझ डालता है।

मैंने विरोध की बात कह कर यहाँ शुरुआत की थी। इस दुनिया के भेदभावपूर्ण झुकाव को इनकार कर ही हम एक बेहतर, अधिक न्यायसंगत दुनिया की मांग करते हैं। और अपने काम के माध्यम से, हम ऐसी दुनिया को बनाने का प्रयास करते हैं।

मैं एक सुलभ, मुफ्त, समावेशी डिजिटल लाइब्रेरी की स्थापना इस लक्ष्य के दिशा में काम का एक हिस्सा मानती हूँ। यह कठिन, जटिल और संभावना तथा विफलता से भरा रास्ता रहेगा। इसमें यह सामुदायिक पुस्तकालय के अन्य सभी पहलुओं की तरह ही है। हमारे बाकी कामों जैसे ही, यह भी इस विश्वास के तहत चलता है कि साहित्य बस कुछ लोगों की संपत्ति नहीं है। अंत में, प्यार ही इसका ईंधन है।

ज़ोया चड्ढा के इस लेख का अनुवाद किया है दीपांजलि सिंह ने!

Libraries, Love, and Resistance: Notes on Building a Free Digital Library during the lockdown

लिंक्स:

टीसीएलपी वालंटियर, आरती द्वारा रीड-अलाउड को देखें:
जुई मौसी की बेटी

TCLP विद्यार्थी परिषद की सदस्य, सिम्पी द्वारा रीड-अलाउड को देखें:
बेटियां भी चाहें आज़ादी

प्रशंसित YA लेखक पारो आनंद द्वारा सुनाई और लिखी गई एक कहानी सुनें:
बबलू की भाभी‘दूनिया सबकी’ वेबसाइट पर अधिक देखें।

Zoya Chadha is Reading Specialist and Project Coordinator at The Community Library Project.
The Community Library Project
Dharam Bhavan, C-13 Housing Society
South Extension Part -1
New Delhi - 110049
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Illustrations provided by Priya Kuriyan.
Creative Commons License
This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-ShareAlike 4.0 International License
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